गिद्ध
गिद्ध नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी है । कुदरत ने इसे एक मुर्दाखोर के रूप में पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने का कार्य सौंपा है, जिसे उसने बखूबी निभाया है । यह मृत पशुओं का भक्षण कर पर्यावरण को साफ़-सुथरा रखते है । एक तरह से गिद्ध मानव समाज के साथी है । लेकिन मानवीय लापरवाही की वजह से गिद्धों के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है ।
हमारे देश में गिद्धों की संख्या एकाएक कम हो गई, इसके कई बड़े कारण है । दरअसल भारत में पशुओं की बीमारियों के उपचार के लिए डिक्लोप्लस नामक दवा का धड़ल्ले से प्रयोग किया जाता है । इस दवा मे डिक्लोफैनेक सोडियम और पैरासिटामोल की मात्रा होती है । उपचार के वक्त यह दवा पशुओं के शरीर में जाती है । पशुओं की मृत्यु के बाद गिद्ध जब उनके मांस का सेवन करते है तो यह दवा उनके शरीर में पहुंच जाती है । वैज्ञानिकों के शोध के मुताबिक़, डिक्लोफैनेक सोडियम ऐसा पदार्थ है, जो गिद्धों की किडनी पर असर करता है । किडनी खराब हो जाने से गिद्ध जल्दी मर जाते है ।





















